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30 साल की उम्र में वतन के लिए फांसी पर चढ़ने वाले भारत के पहले स्वतंत्र संग्रामी मंगल पांडे की आज जन्मतिथि

आज का दिन भारत के इतिहास में स्वतंत्रता संग्राम के लिए काफी अहम था. ऐसा इसलिए क्योंकि आज ही के दिन 19जुलाई, 1827 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. महान क्रांतिकारी मंगल पांडे का जन्म  हुआ था. ब्रिटिश शासन  के खिलाफ मंगल पांडे ने ही 1857 की क्रांति की आग लगाई थी. 







जब उन्होंने देखा कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारतीयों को खूब प्रताड़ित करती है, तो उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. मंगल पांडे कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री की पैदल सेना के 1446 नंबर के सिपाही थे. जब वे भर्ती हुए तो उनकी उम्र महज 22 वर्ष थी.

मंगल पांडे वो पहले शख्स थे, जिसने न केवल अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई. वैसे तो मंगल पांडे सैनिक के तौर पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में भर्ती हुई थे. पर जब उन्होंने देखा कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारतीयों को खूब प्रताड़ित करती है, तो उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. जब वे भर्ती हुए तो उनकी उम्र महज 22 वर्ष थी.

सेना की बंगाल इकाई में एनफील्ड पी-53 रायफल में लगाने के लिए नए कारतूस सैनिकों में बांटे जाने थे. ये ऐसे कारतूस थे, जिन्हें बंदूक में लगाने से पहले मुंह से खोलना पड़ता था. इस बीच यह खबर फैली की जो कारतूस सैनिकों को दिए गए हैं, उनमें गाय और सूअर की चर्बी का इस्तेमाल किया गया है. अब सेना में हिंदू भी थे और मुसलमान भी थे. हिंदुओं के लिए गाय मां समान है. ऐसे में इन कारतूसों को मुंह लगाना उनके लिए पाप था और मुसलमान सूअर की चर्बी को मुंह नहीं लगा सकते थे. ये कारतूस मंगल पांडे को भी दिए गए. पर उन्होंने इन्हें लेने से इनकार कर दिया.

कारतूसों का इस्तेमाल करने से इनकार कर देने के कारण अंग्रेजों ने रेजिमेंट को नि:शस्त्र करने की योजना बनाई. इस बीच अब मंगल पांडे को ब्रिटिश हुकूमत खटकने लगी थी. उनके अंदर ब्रिटिश राज के खिलाफ इतना गुस्सा था कि उन्होंने विद्रोह कर दिया. 

29 मार्च, 1857 ये वही दिन था जब मंगल पांडे ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम का पहला बिगुल फूंका.विद्रोह की वजह स्व अंग्रेजों ने मंगल पांडे को अपने काबू में करने की कोशिश जब ब्रिटिश अधिकारियों ने की, तो उन्होंने सार्जेंट मेजर ह्वीसन और अडज्यूटेंट लेफ्टिनेंट बेंपदे बाग पर हमला कर दिया.

 इसके बाद जनरल द्वारा मंगल पांडे की गिरफ्तारी का आदेश दिया गया, पर एक सिपाही शेख पलटू के अलावा सभी सैनिकों ने मंगल पांडे को गिरफ्तार करने मना कर दिया. 

18 अप्रैल, 1857 यह दिन मंगल पांडे की फांसी के लिए मुकर्रर किया गया. कहा जाता है कि जब मंगल पांडे को फांसी देने के लिए लाया गया तो बैरकपुर जेल के जल्लादों ने उनके खून से अपने हाथ रंगने से इनकार कर दिया था. इसके बाद ब्रिटिश हुकूमत को कलकत्ता से जल्लाद बुलाने पड़े थे. मंगल पांडे भले ही शहीद हो गए हों, लेकिन जो लो उन्होंने भारतीय लोगों के अंदर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आग जलाई थी, वो काफी सालों तक जिंदा रही. और इसका परिणाम यहीं था कि ब्रिटिश हुकूमत को एक दिन भारत से जाना पड़ा.
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